-:"परम्परा का स्ववागत,एक हद तक ":-

परम्परा की स्वागत होनी चाहिए,लेकिन सीमा निर्धारण के अंदर।
                             लोग क्या कहेंगे,–के अंजाने भय के चलते बहुत से लोग जीवन में उन्नति नहीं कर पाते।क्योंकि वे समाज में प्रचलित परंपराओं से इतना प्रभावित हो गए होते हैं,की जीवन में सही– गलत का भी ठीक तरह से परीक्षण नहीं कर पाते और फिर वही करते है जो समाज ने उन्हें इजाजत दे रखी है।इस प्रकार से ऐसे लोगों को अनेक तरह के कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,और वे उन्नति के शिखर तक नहीं पहुंच पाते।
                        आप हर क्षण जो निर्णय लेते है,उससे आपके भाग्य का निर्माण होता है।
                     जिस प्रकार क्या पढ़ें से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्या न पढ़ें,उसी प्रकार महत्वपूर्ण है क्या करें और कया न करें,क्या बोलें और क्या न बोलें।
                        ‘सफलता का मूल मंत्र स्वमुल्यांकन करना है।’
                         यथासंभव लोगो को सहयोग करें तथा हमेशा सकारात्मक सोचें।अगर एकाग्रता में कोई तत्व बाधक हो रहा हो तो उसे ढूंढें और पहले उसे दूर करें।फिर देखें परिणाम हमेशा सकारात्मक होगा।किसी काम को हाथ में लें तो हर वक्त सिर्फ और सिर्फ उसी के बारे में सोचें और उसे पूरा करें।
                          लक्ष्य को एक–एक कर के सामने लाएं और एक को पूरा कर लेने के बाद ही दूसरे को हाथ लगाएं।सफल एवम उच्च प्रवृति वाले लोगों के संपर्क में हमेशा बने रहें और समय–समय पर उनसे मार्गदर्शन लेते रहें।
                        लोग क्या कहेंगे, इसकी चिंता छोड़ें और वही करे जो स्वमुल्यांकन उपरांत चीजें अच्छी एवम सटीक हो।
              किसी काम में कूदने से पहले उसके लिए जरूरी सामग्री एवम आवस्यक चीजें अनिवार्य है जो आपके लक्ष्य पूर्ति में मदद करें।फिर रणनीती संबंधी क्षेत्र के लोगो से परामर्श ले कर अपनी तरफ से सत प्रतिशत परिश्रम करें परिणाम आपके अनुकूल होंगे।
                      श्री गोपाल दास नीरज की पंक्ति है की–कुछ सपनो के मार जाने से जीवन नही मरा करती है,कुछ दीपों के बुझ जाने से आंगन नही अंधेरा रहता हैं,चंद खिलौनों को टूटने से बचपन नही सुना रहता है,कुछ पानी के बह जाने से सावन नही सुना रहता है।
                        इसलिए जीवन पथ में आए कुछ बाधाओं से असफल हुऐ लक्ष को पुनः पाया जा सकता है अगर दृढ़ इक्षा और संकल्प जीवित हो।
            इरादें हो अगर अटल,
            तो मंजिल खुद ही मिलती हैं।
            पत्थर भी पिघलतें हैं,
            नदियां रुख बदलती हैं।।
                            #देशबंधु कुमार...


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